
Rajkumar Dhiman, Dehradun: देहरादून के एक होटल मैनेजमेंट संस्थान के 09 छात्रों के विदेश में रोजगार पाने के सपने उस समय टूट गए, जब उन्हें कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों और भ्रामक आश्वासनों के आधार पर अलग-अलग देशों में भेज दिया गया। आरोप है कि छात्रों से कुल 52 लाख रुपये वसूले गए, लेकिन विदेश पहुंचने के बाद उन्हें न तो वादा की गई नौकरी मिली और न ही रोजगार से जुड़ी व्यवस्थाएं। कुछ छात्रों को इमिग्रेशन स्तर पर ही वापस भेज दिया गया, जबकि अन्य कई दिनों तक होटलों में फंसे रहे।
संस्थान प्रबंधन के अनुसार, एक प्लेसमेंट एजेंसी ने दुबई, मलेशिया, श्रीलंका और अन्य देशों के होटल, क्रूज तथा हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में रोजगार दिलाने का दावा किया था। एजेंसी की ओर से जॉब ऑफर लेटर, वीजा और अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, जिन्हें प्रारंभिक जांच में सही माना गया। इसी भरोसे पर छात्रों को विदेश भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई।
श्रीलंका पहुंचते ही खुली पोल
संस्थान के मुताबिक, सबसे पहले चार छात्रों को श्रीलंका भेजा गया। इनमें उत्तराखंड के नैनीताल का एक छात्र भी शामिल था। छात्रों का कहना है कि उन्हें यात्रा के दौरान स्वयं को पर्यटक बताने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, श्रीलंका पहुंचने पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की और कथित अनियमितताएं सामने आने के बाद चारों छात्रों को रोक लिया गया। करीब 12 घंटे तक एयरपोर्ट पर रखने के बाद उन्हें भारत वापस भेज दिया गया। छात्रों का दावा है कि उन्हें दस्तावेजों में किसी गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी। बाद में एजेंसी ने कथित तौर पर त्रुटि स्वीकार करते हुए दोबारा विदेश भेजने का आश्वासन दिया।
बैंकॉक और मलेशिया में लंबा इंतजार
इसके बाद कुछ युवाओं को बैंकॉक भेजा गया, जहां उन्हें बताया गया कि उनकी जॉइनिंग प्रक्रिया में देरी हो रही है। छात्रों के अनुसार, वे लगभग 22 दिनों तक होटल में रुके रहे और उन्हें लगातार नई-नई तारीखें देकर इंतजार कराया जाता रहा।
इसी तरह मलेशिया पहुंचे छात्रों को भी लंबे समय तक होटल में ठहराया गया। हालात ऐसे बने कि कुछ युवाओं के पास दैनिक खर्च और भोजन के लिए भी पर्याप्त धन नहीं बचा, जिसके बाद उन्हें परिवारों से आर्थिक मदद लेनी पड़ी। अलग-अलग देशों से मिल रही समान शिकायतों के बाद संस्थान को पूरे मामले पर गंभीर संदेह हुआ।
जांच में सामने आईं कथित अनियमितताएं
छात्रों की शिकायतों के बाद संस्थान ने अपने स्तर पर पड़ताल शुरू की। जांच के दौरान यात्रा और होटल बुकिंग से जुड़े कई दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। प्रबंधन का कहना है कि कुछ बुकिंग की पुष्टि नहीं हो सकी, जबकि रोजगार और वीजा से जुड़े कई दावों पर भी सवाल खड़े हुए।
संस्थान का आरोप है कि अप्रैल के अंत में मामले की शिकायत स्थानीय पुलिस को दी गई थी। प्रबंधन के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर उन्हें और साक्ष्य जुटाने तथा तथ्यों का सत्यापन कराने की सलाह दी गई। उनका दावा है कि शिकायत विभिन्न पुलिस अधिकारियों तक पहुंची, लेकिन तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
छात्रों को निकालने के लिए खुद विदेश पहुंचे संस्थान के अधिकारी
संस्थान के वाइस प्रेसिडेंट खुशाल सिंह अधिकारी ने कथित तौर पर स्वयं विदेश जाकर स्थिति का आकलन किया। प्रबंधन के अनुसार, उन्होंने श्रीलंका, बैंकॉक और दुबई सहित कई स्थानों पर जाकर छात्रों से मुलाकात की तथा मामले से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी एकत्र की।
करीब 20 दिनों तक चले प्रयासों के दौरान विदेश यात्रा, ठहराव और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई संपर्कों की पहचान की गई। संस्थान का दावा है कि इसी जांच के दौरान एजेंसी से जुड़े कथित नेटवर्क और उसके संचालन से संबंधित जानकारी सामने आई।
सभी छात्रों की वापसी, कुछ को मिला नया रोजगार
संस्थान के अनुसार, बाद में विदेशों में फंसे सभी छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। बैंकॉक और मलेशिया में मौजूद युवाओं को भारत वापस लाया गया, जबकि दुबई में मौजूद कुछ छात्रों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था भी की गई। प्रबंधन का कहना है कि कई छात्रों को नई नौकरियां मिल चुकी हैं और अन्य के लिए प्रयास जारी हैं।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का छात्रों पर गहरा असर पड़ा। एक छात्र के अनुसार, डिपोर्ट किए जाने के कारण उसके यात्रा रिकॉर्ड पर प्रभाव पड़ा और विदेश में करियर बनाने की उसकी योजना को झटका लगा। कई छात्रों के महीनों का समय और बड़ी राशि इस प्रक्रिया में खर्च हो गई।
पुलिस जांच शुरू
अब पुलिस ने एजेंसी से जुड़े पति-पत्नी के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वहीं संस्थान प्रबंधन का कहना है कि यदि शुरुआती शिकायत पर शीघ्र कार्रवाई होती तो मामले की जांच और आरोपियों तक पहुंचने की प्रक्रिया और तेज हो सकती थी। जांच एजेंसियां अब पूरे घटनाक्रम, वित्तीय लेनदेन और कथित भर्ती नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।



