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गर्भगृह में हथियार के साथ घुसे डीएम, विवाद खड़ा हुआ तो जांच शरू

जागेश्वर धाम में पूजा अर्चना करने पहुंचे बरेली के डीएम ने अपने साथ कार्बाइन से लैस सुरक्षा कर्मी को भी कराया प्रवेश

Rajkumar Dhiman, Uttarakhand: उत्तराखंड के जागेश्वर धाम में एक प्रशासनिक दौरे के दौरान उस समय विवाद खड़ा हो गया, जब उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के डीएम अविनाश सिंह मंदिर के गर्भगृह में पूजा के लिए पहुंचे और उनके साथ एक सुरक्षाकर्मी हथियार (कार्बाइन) के साथ अंदर मौजूद रहा। इस घटना ने धार्मिक मर्यादाओं और सुरक्षा प्रोटोकॉल के बीच संतुलन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुजारियों और स्थानीय लोगों का विरोध
मंदिर से जुड़े पुजारियों और स्थानीय लोगों ने इस घटना पर कड़ा ऐतराज जताया। उनका कहना है कि गर्भगृह जैसे पवित्र स्थल में किसी भी प्रकार का हथियार ले जाना परंपराओं के विरुद्ध है। विरोध करने वालों का आरोप है कि आपत्ति के बावजूद अधिकारियों ने सुरक्षा का हवाला देकर प्रवेश किया, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

पुजारियों का यह भी कहना है कि पहले कई बड़े नेता और अधिकारी यहां दर्शन करने आए, लेकिन कभी भी गर्भगृह में हथियार ले जाने की अनुमति नहीं दी गई। इसलिए भविष्य में ऐसी घटनाओं पर स्पष्ट रोक लगनी चाहिए।

ASI ने माना नियमों का उल्लंघन
इस पूरे मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सख्त रुख अपनाया है। देहरादून सर्किल के अधिकारियों के अनुसार, मंदिर परिसर में हथियार ले जाना नियमों के खिलाफ है। विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी है और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की बात कही है।

मंदिर प्रशासन ने उठाई सख्त नियमों की मांग
मंदिर से जुड़े संतों और प्रबंधन ने प्रशासन को पत्र लिखकर मांग की है कि मंदिर परिसर में हथियारों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू किया जाए। प्रवेश द्वार पर स्पष्ट नियमावली प्रदर्शित की जाए और वीआईपी और आम श्रद्धालुओं के लिए एक समान नियम हों। महामंडलेश्वर हेमंत भट्ट ने कहा कि जागेश्वर धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, ऐसे में किसी भी तरह का विशेषाधिकार धार्मिक वातावरण को प्रभावित करता है।

विवाद के बाद ‘नो आर्म्स’ पोस्टर लगाए गए
घटना के बाद ASI ने तुरंत कार्रवाई करते हुए मंदिर परिसर में “नो आर्म्स” के पोस्टर चस्पा कर दिए हैं। साथ ही स्थायी सूचना बोर्ड लगाने की भी तैयारी की जा रही है, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा न बने।

मामला क्यों बना बड़ा मुद्दा?
यह विवाद सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल धार्मिक मर्यादाओं से ऊपर हो सकता है? क्या वीआईपी व्यक्तियों के लिए अलग नियम होने चाहिए? और धार्मिक स्थलों पर एक समान नियम लागू करने की जरूरत कितनी है?फिलहाल, जांच के नतीजों का इंतजार है, लेकिन इस घटना ने प्रशासन और धार्मिक परंपराओं के बीच तालमेल को लेकर एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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