टिहरी के 940 गांवों पर भूस्खलन का खतरा, छह गांव अति-संवेदनशील सूची में
ताजा वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आई चिंताजनक स्थिति, दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित

Rajkumar Dhiman, Dehradun: टिहरी गढ़वाल में भूस्खलन की संवेदनशीलता को लेकर ताजा अध्ययन में 940 गांवों में खतरे की नई तस्वीर सामने आई है। स्पैशियल इंफॉर्मेशन रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन में 1,600 पुराने भूस्खलन स्थानों और उन्हें प्रभावित करने वाले 17 कारकों के आधार पर भूस्खलन को लेकर रिस्क मैप तैयार किया गया है। जिसमें स्पष्ट किया गया कि टिहरी के दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों को अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील पाया गया, जबकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में संवेदनशीलता काफी कम रही।
1,600 भूस्खलनों से इस तरह तैयार हुआ वैज्ञानिक आधार
शोधकर्ताओं ने 31 दिसंबर 2004 से 11 नवंबर 2022 के बीच उपलब्ध गूगल अर्थ चित्रों, पूर्व प्रकाशित अध्ययनों, सरकारी रिपोर्ट, समाचार रिपोर्ट और मैदानी सर्वेक्षणों से 1,600 भूस्खलन स्थान दर्ज किए। इन स्थानों का जीपीएस और उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के ऐतिहासिक आंकड़ों से भी सत्यापन किया गया। मॉडल तैयार करने के लिए 1,120 भूस्खलन स्थान और परीक्षण के लिए 480 स्थान रखे गए।
टिहरी जिले का क्षेत्रफल 3,642 वर्ग किलोमीटर है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां 1,862 गांव हैं और आबादी 6,18,931 थी। अध्ययन में इसी व्यापक क्षेत्र पर भूस्खलन संवेदनशीलता का स्थानिक मॉडल तैयार किया गया।
17 कारकों से पहाड़ की कमजोरी जांची
वैज्ञानिकों ने भूस्खलन के पीछे काम करने वाले 17 कारकों को मॉडल में शामिल किया। इनमें ढलान, ऊंचाई, ढलान की दिशा, धरातल की वक्रता, स्थलाकृतिक आर्द्रता सूचकांक, स्थलाकृतिक स्थिति सूचकांक, वार्षिक वर्षा, जलधारा शक्ति सूचकांक, नदी से दूरी, मिट्टी का प्रकार, मिट्टी की बनावट, मिट्टी की गहराई, भूविज्ञान, भूगर्भीय रेखाओं का घनत्व, भूमि उपयोग-भूमि आवरण, सड़क से दूरी और वनस्पति सूचकांक शामिल हैं।
इनमें नदी से दूरी सबसे प्रभावशाली कारक निकली। इसके बाद ऊंचाई, ढलान, वर्षा और वनस्पति सूचकांक का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार नदी के नजदीक कटाव और ढलान के आधार का कमजोर होना भूस्खलन की संभावना बढ़ा सकता है।
टिहरी के किन हिस्सों में खतरा ज्यादा?
पांचों मॉडल के परिणामों में एक समान क्षेत्रीय पैटर्न दिखाई दिया। पश्चिमी, दक्षिणी और मध्य टिहरी में भूस्खलन संवेदनशीलता अधिक रही, जबकि उत्तर-पूर्वी टिहरी अपेक्षाकृत बहुत कम संवेदनशील क्षेत्र के रूप में सामने आया। शोधकर्ताओं ने इसके पीछे तीखी ढलान, ऊंचाई, वर्षा, मिट्टी, भूगर्भीय संरचना और मानवीय गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव को महत्वपूर्ण माना है।
940 गांव इस तरह उच्च और अति-उच्च संवेदनशीलता वाले
अध्ययन में 1,853 गांवों का संवेदनशीलता मानचित्र के साथ विश्लेषण किया गया। इनमें लगभग 500 गांव यानी 27 प्रतिशत अति-उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में पाए गए। इसके अलावा करीब 440 गांव यानी 23 प्रतिशत उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में स्थित मिले। यानी कुल मिलाकर लगभग 940 गांव उच्च या अति-उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्र में आते हैं।
अध्ययन में अति-उच्च संवेदनशीलता वाले गांवों के उदाहरण के रूप में विशेष रूप से चिला, लोल्डी, चांठी, घड़ियालधार, पाली तल्ली और कांडी जेठुकी के नाम दिए गए हैं। शोधकर्ताओं ने इनके साथ अन्य गांवों को भी इस श्रेणी में रखा है, लेकिन मूल शोध के निष्कर्ष में इन छह गांवों के नाम स्पष्ट रूप से उदाहरण के रूप में दिए गए हैं।
इन छह गांवों पर क्यों चिंता?
शोध के अनुसार इन क्षेत्रों में भूगर्भीय गतिविधि, भारी वर्षा, तेजी से घटता वनावरण और बस्तियों का विस्तार मिलकर भूस्खलन संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। इसलिए इन गांवों को “भूस्खलन होने वाला गांव” कहना सही नहीं होगा; वैज्ञानिक भाषा में इन्हें बहुत अधिक भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्र कहना अधिक सटीक है।
करीब 18 प्रतिशत क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील
डीप लर्निंग न्यूरल नेटवर्क यानी डीएलएनएन के परिणाम में टिहरी के 17.74 प्रतिशत क्षेत्र को अति-उच्च और 16.61 प्रतिशत को उच्च संवेदनशीलता श्रेणी में रखा गया। दोनों को मिलाकर 34.35 प्रतिशत क्षेत्र उच्च से अति-उच्च संवेदनशीलता में आता है। अलग-अलग मॉडल में यह संयुक्त आंकड़ा 37.07 से 40.90 प्रतिशत तक रहा।
शोध की चर्चा में वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्र को अत्यधिक संवेदनशील बताया है। यह अंतर इसलिए है क्योंकि “अति-उच्च” और “उच्च” श्रेणियां अलग-अलग हैं। दोनों को जोड़ने पर डीएलएनएन मॉडल में आंकड़ा 34.35 प्रतिशत बनता है।
डीप लर्निंग तकनीक से आकलन, मिला सबसे बेहतर परिणाम
वैज्ञानिकों ने पांच मॉडल की तुलना की। जिसमें रैंडम फॉरेस्ट, नाइव बेयस, एक्सट्रीम ग्रेडिएंट बूस्टिंग, कैनोनिकल कोरिलेशन फॉरेस्ट और डीप लर्निंग न्यूरल नेटवर्क शामिल रहे। इनमें डीएलएनएन सबसे बेहतर रहा। इसका एयूसी 90.31 प्रतिशत रहा। रैंडम फॉरेस्ट का एयूसी 85.33 प्रतिशत, कैनोनिकल कोरिलेशन फॉरेस्ट का 86.19 प्रतिशत, एक्सजीबूस्ट का 84.62 प्रतिशत और नाइव बेयस का 81.74 प्रतिशत रहा। डीएलएनएन में आरएमएसई 0.18 और एमएई 0.12 रहा, जो पांचों मॉडल में सबसे कम था।
एयूसी को आसान भाषा में समझें तो यह बताता है कि मॉडल भूस्खलन की अधिक और कम संभावना वाले स्थानों को कितनी अच्छी तरह अलग कर पा रहा है। यह 90.31 प्रतिशत का आंकड़ा किसी निश्चित तारीख को भूस्खलन होने की भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि संवेदनशीलता मानचित्र की पूर्वानुमान क्षमता बताता है।
पानी और सड़कें अहम
अध्ययन में नदी से दूरी को सबसे महत्वपूर्ण कारक पाया गया। इसके अलावा बारिश और पानी से जुड़ी जलधारा शक्ति सूचकांक तथा स्थलाकृतिक आर्द्रता सूचकांक भी मॉडल में शामिल किए गए। बारिश का पानी जमीन में प्रवेश करके मिट्टी और महीन सामग्री को नम करता है। टिहरी की कई जगहों पर यह सामग्री ढीले मलबे और नीचे मौजूद कठोर, मुड़ी हुई तथा भ्रंशयुक्त चूना पत्थर की सतह के बीच जमा हो सकती है। पानी से संतृप्त होने पर यह चिकनी परत फिसलन वाली सतह बन सकती है, जिस पर ऊपर का मलबा नीचे खिसक सकता है।
शोध में सड़क से दूरी और भूमि उपयोग-भूमि आवरण भी शामिल किए गए हैं। वैज्ञानिकों ने वनावरण में कमी, शहरी विस्तार और सड़क निर्माण को संवेदनशीलता बढ़ाने वाले मानवीय दबावों से जोड़ा है। हालांकि अध्ययन यह नहीं कहता कि प्रत्येक भूस्खलन का कारण सड़क निर्माण ही है।
भूगर्भीय संरचना भी टिहरी को संवेदनशील बनाती है
टिहरी क्षेत्र में ग्नाइस, चूना पत्थर, फिलाइट, क्वार्टजाइट और स्लेट जैसी चट्टानें पाई जाती हैं। यहां चट्टानी संरचनाओं में जटिल मोड़, भ्रंश और ओवरथ्रस्ट संरचनाएं हैं। ऐसी भूगर्भीय परिस्थितियां और मानसून की भारी वर्षा मिलकर ढलानों की अस्थिरता बढ़ा सकती हैं। अध्ययन यह भी बताता है कि टिहरी भूकंपीय क्षेत्र-4 में है, जिससे अत्यधिक परिस्थितियों में भूस्खलन की संवेदनशीलता और बढ़ सकती है।
अब प्रशासन के लिए क्या मतलब?
वैज्ञानिकों ने उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में ढलान स्थिरीकरण, बेहतर जल निकासी, ढलान का उचित कोण, कंटूर ट्रेंचिंग, वनीकरण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, खतरा क्षेत्र निर्धारण और त्वरित प्रतिक्रिया दल जैसे उपायों की जरूरत बताई है। साथ ही भूमि उपयोग और निर्माण की योजना बनाते समय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र को आधार बनाने की सलाह दी गई है।
शोध किसने किया?
यह अध्ययन सुनील साहा, अनिक साहा, सुभेंदु जाना, प्रियंका गोगोई, सोमनाथ रुद्र और बिस्वजीत प्रधान ने किया। पहले चार लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ गौर बंगा, सोमनाथ रुद्र विद्यासागर यूनिवर्सिटी और बिस्वजीत प्रधान यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी से संबद्ध हैं।



