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“न्यायिक कार्य करते समय मजिस्ट्रेट DM-SP और सीएम से भी ऊपर”, क्या नजीर बनेगा हाई कोर्ट का यह आदेश

CJM के आदेशों की अवमानना पर एसएचओ और आईओ कोर्ट रूम में दिनभर की कस्टडी में भेजे गए, पीड़ित को 1 लाख मुआवज़े का निर्देश; CCTV फुटेज गायब करने पर पुलिस पर तगड़ी टिप्पणी

Round The Watch News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ कहा है कि न्यायिक अधिकारी अपनी न्यायिक ड्यूटी का पालन करते हुए न केवल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (डीएम) और डिस्ट्रिक्ट पुलिस प्रमुख (एसएसपी/एसपी), बल्कि राज्य के राजनीतिक मुखिया सीएम से भी ऊपर होता है। ऐसे में ज्यूडिशियल ऑर्डर की अवहेलना “माफ़ करने योग्य नहीं” मानी जाएगी और यह कानून के शासन पर सीधा प्रहार है। कोर्ट का यह आदेश पूरे देश मे नजीर बन सकता है या और परिष्कृत रूप में भी सामने आ सकता है। क्योंकि, कमोबेश ऐसी स्थिति सभी जगह नजर आती है।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने ललितपुर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) के आदेश की पुलिस अधिकारियों की ओर से की गई लगातार अनदेखी पर न सिर्फ तल्ख टिप्पणी की, बल्कि अदालत ने मामले में SHO और आईओ दोनों को कंटेम्प्ट का दोषी ठहराते हुए कोर्ट उठने तक कस्टडी में रहने की सज़ा सुनाई।

मामले का सार: गैर-कानूनी हिरासत और कोर्ट आदेश का खुला उल्लंघन
सानू उर्फ राशिद को 14 सितंबर 2025 को कथित रूप से बिना आधिकारिक गिरफ्तारी के पुलिस कस्टडी में ले लिया गया। उनकी बहन ने 16 सितंबर को CJM के समक्ष आवेदन देकर यह आरोप दोहराया और CCTV फुटेज प्रस्तुत करने का निर्देश मांगा। CJM ने 22 सितंबर, 30 सितंबर और 3 नवंबर 2025 को स्पष्ट आदेश जारी कर SHO और IO को निर्देश दिया कि हिरासत संबंधी CCTV फुटेज प्रस्तुत करें। महिला सह-आरोपी रशीदा को रात 4 बजे गिरफ्तार करने का कारण बताएं और सप्रीम कोर्ट के परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह केस के अनुरूप CCTV संरक्षित रखने का पालन सुनिश्चित करें। लेकिन किसी भी आदेश का पालन नहीं किया गया। CJM की चेतावनी के बावजूद पुलिस अधिकारियों ने न रिपोर्ट दी, न फुटेज।

CCTV फुटेज ‘अपने आप डिलीट हो गई’—अदालत ने कहा: जानबूझकर अनदेखी
हाईकोर्ट में पेश होकर SHO और IO ने दावा किया कि CCTV की स्टोरेज क्षमता 10 TB ही थी, इसलिए दो महीने बाद फुटेज ऑटो-डिलीट हो गई। उन्होंने इसे “गलती” बताकर बिना शर्त माफी भी मांगी। लेकिन अदालत ने यह स्पष्टीकरण सिरे से नकारते हुए कहा, “यह महज़ चूक नहीं, ज्यूडिशियल आदेशों का जानबूझकर अवमाननापूर्ण उल्लंघन है। अदालत अपनी ही प्राधिकृति के अपमान पर आंखें बंद नहीं कर सकती।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यूपी के कई थानों में CCTV कैमरों का सही मेंटेनेंस न होना “रूटीन पैटर्न” बन गया है, जिससे अनलॉफुल डिटेंशन और हिरासत में अत्याचार जैसी घटनाएं पनपती हैं।

‘न्यायिक अधिकारी प्रशासनिक प्रमुखों से ऊपर’: हाईकोर्ट का तीखा अवलोकन
ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा, जजों की तुलना प्रशासनिक/एग्जीक्यूटिव अधिकारियों से नहीं की जा सकती
वे सॉवरेन फंक्शन निभाते हैं। न्यायिक अधिकारी राहत चाहने वाले आम व्यक्ति की पहली रक्षा पंक्ति हैं। अदालत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “जब एक ज्यूडिशियल ऑफिसर न्यायिक कार्य कर रहा होता है, तो वह DM, SP और राज्य के राजनीतिक हेड से भी ऊपर होता है।”

मानवाधिकार का उल्लंघन: परिवार को बताए बिना 3 दिन हिरासत में 01 लाख मुआवज़ा
हाईकोर्ट ने पाया कि सानू को तीन दिनों तक बिना सूचना परिवार से छिपाकर रखा गया, जो डी.के. बसु गाइडलाइंस का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने आदेश दिया राज्य सरकार पीड़ित को 1 लाख रुपए का मुआवज़ा दे। यह रकम जिम्मेदार पुलिस कर्मियों की तनख्वाह से वसूली जा सकती है।

CJM/Magistrate अब पुलिस स्टेशनों में CCTV का रैंडम निरीक्षण करेंगे
हाईकोर्ट ने सभी जिलों के CJM और संबंधित मजिस्ट्रेटों को यह निर्देश दिए वे कोर्ट-ऑवर्स के बाद पुलिस थानों का CCTV निरीक्षण कर सकते हैं। यह उनकी आधिकारिक ड्यूटी मानी जाएगी। पुलिस अधिकारियों को पूरा सहयोग देना होगा। किसी भी ज्यूडिशियल अधिकारी के साथ बहस, रुकावट या अनादर पर सख्त कार्रवाई होगी।

अंतिम परिणाम: SHO–IO दोषी, कोर्ट कस्टडी की सज़ा; आरोपी को ज़मानत
अदालत ने कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 10 के तहत SHO और IO को दोषी पाया और कोर्ट बैठने के दौरान कस्टडी में भेज दिया। सानू उर्फ राशिद को ज़मानत देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वह 15 दिनों के भीतर 15 लाख रुपये शिकायतकर्ता की फाइनेंस कंपनी को ट्रांसफर करेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश एक बार फिर याद दिलाता है कि ज्यूडिशियल प्राधिकृति सर्वोच्च है।अदालत के आदेशों की अनदेखी न्याय-व्यवस्था पर हमला है। पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करना न्यायपालिका का दायित्व है। यह फैसला न केवल पुलिस-ज्यूडिशरी संबंधों में अनुशासन स्थापित करता है, बल्कि आम नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को भी मजबूत करता है।

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